Wednesday, February 17, 2010

अदम गोंडवी की कविता आज के दौर के लिए
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है

लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

Monday, February 1, 2010

बड़ा आश्चर्य होता है की गुलज़ार साहब जैसे स्थापित शायर को किसी की कविता कॉपी करने की क्या जरूरत पड़ गई। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना मेरे गृह जिले बस्ती में पैदा हुए और इलाहाबाद को अपनी कर्मस्थली बनाई । संयोग से मैं दोनों ही स्थलों से जुड़ा हूँ, और यही मेरे इस लेख को लिखने की मजबूरी भी है। मैं किसी पर आक्षेप नहीं कर रहा बल्कि सही व्यक्ति को उसका अधिकार दिलवाने की कोशिश मात्र कर रहा हूँ। अगर गुलज़ार साहब " इश्किया" फिल्म के अपने " इब्नबतूता" वाले गाने के लिए सक्सेना साहब को भी थोडा सा श्रेय दे देते तो शायद कष्ट इस तरह लेख बनकर मेरे हृदय से न निकलता।

आपके लिए सर्वेश्वर दयाल की कविता नीचे लिखी है अब आप ही फैसला कीजिये
"इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में


कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता


उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में।"