Friday, May 28, 2010

आपके लिए ख्वाजा मीर दर्द की एक नज़्म

अगर यों ही ये दिल सताता रहेगा
तो इक दिन मेरा जी ही जाता रहेगा

मैं जाता हूँ दिल को तेरे पास छोड़े
मेरी याद तुझको दिलाता रहेगा

गली से तेरी दिल को ले तो चला हूँ
मैं पहुँचूँगा जब तक ये आता रहेगा

क़फ़स[1] में कोई तुम से ऐ हम-सफ़ीरों
ख़बर कल की हमको सुनाता रहेगा

ख़फ़ा हो कि ऐ "दर्द" मर तो चला तू
कहाँ तक ग़म अपना छुपाता रहेगा
माफ़ करियेगा इतने दिनों तक आपसे दूर रहने के लिए, दरअसल मैं अपने कामों में इतना मशरूफ था की वक़्त ही नहीं मिला या यूं कहिये की जिन्दगी से जद्दोजहद कर रहा था, हालाँकि अभी पूरी तरह छुट्टी नहीं मिली है लेकिन आप लोगों से मुखातिब हुए बिना चैन भी तो नहीं मिलता. आप लोगों को ढेर सारी शुभकामनाओ के साथ अभी मैं बिदा लेता हूँ, इस वादे के साथ की जल्दी ही आपकी सेवा में उपस्थित होऊंगा.

Wednesday, February 17, 2010

अदम गोंडवी की कविता आज के दौर के लिए
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है

लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

Monday, February 1, 2010

बड़ा आश्चर्य होता है की गुलज़ार साहब जैसे स्थापित शायर को किसी की कविता कॉपी करने की क्या जरूरत पड़ गई। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना मेरे गृह जिले बस्ती में पैदा हुए और इलाहाबाद को अपनी कर्मस्थली बनाई । संयोग से मैं दोनों ही स्थलों से जुड़ा हूँ, और यही मेरे इस लेख को लिखने की मजबूरी भी है। मैं किसी पर आक्षेप नहीं कर रहा बल्कि सही व्यक्ति को उसका अधिकार दिलवाने की कोशिश मात्र कर रहा हूँ। अगर गुलज़ार साहब " इश्किया" फिल्म के अपने " इब्नबतूता" वाले गाने के लिए सक्सेना साहब को भी थोडा सा श्रेय दे देते तो शायद कष्ट इस तरह लेख बनकर मेरे हृदय से न निकलता।

आपके लिए सर्वेश्वर दयाल की कविता नीचे लिखी है अब आप ही फैसला कीजिये
"इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में


कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता


उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में।"

Saturday, January 30, 2010

आज के मध्यम वर्ग पर कुंवर बेचैन की कविता

बर्तन की यह उठका-पटकी

यह बात-बात पर झल्लाना

चिट्ठी है किसी दुखी मन की।


यह थकी देह पर कर्मभार

इसको खाँसी, उसको बुखार

जितना वेतन, उतना उधार

नन्हें-मुन्नों को गुस्से में

हर बार, मारकार पछताना

चिट्ठी है किसी दुखी मन की।


इतने धंधे। यह क्षीणकाय-

ढोती ही रहती विवश हाय

ख़ुद ही उलझन, खुद ही उपाय

आने पर किसी अतिथि जन के

दुख में भी सहसा हँस जाना

चिट्ठी है किसी दुखी मन की।

आज के दौर पर कैफ़ी साहब की एक नज़्म
हाथ आकर लगा गया कोई

मेरा छप्पर उठा गया कोई


लग गया इक मशीन में मैं

शहर में ले के आ गया कोई


मैं खड़ा था के पीठ पर मेरी

इश्तिहार इक लगा गया कोई


यह सदी धूप को तरसती है

जैसे सूरज को खा गया कोई


ऐसी मंहगाई है के चेहरा भी

बेच के अपना खा गया कोई


अब बोह अरमान हैं न वो सपने

सब कबूतर उड़ा गया कोई


वोह गए जब से ऐसा लगता है

छोटा मोटा खुदा गया कोई


मेरा बचपन भी साथ ले आया

गांव से जब भी आ गया कोई


आज की शिक्षा व्यवस्था

आजकल मैं अपने गाँव में हूँ और अपने आप को समाज के प्रति जिम्मेदार समझ कर गाँव के बच्चों को पढाने के लिए बहुत ही मनोयोग से जुट गया, लेकिन यह देख कर इतना दुःख हुआ कि कक्षा ५ या ६ में पढने वाले विद्यार्थी को ना तो ठीक से पहाडा आता है ना तो इमला और अंग्रेजी तो माशाल्लाह है॥ क्या सारी जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही है अभिभावकों की नहीं। और सरकार के ६५% साक्षरता के दावों का क्या, क्या इसी को साक्षर कहते हैं? हमारे अध्यापक तो बस किसी तरह कोरम पूरा कर रहें हैं। आइये कुछ प्रयास करें की आने वाली पीढ़ी हमें कोसे नहीं।

Friday, January 29, 2010

कैफ़ी साहब की नज़्म आप के लिए

तुम परेशां न हो बाब-ए-करम वा न करो
आैर कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा
इसी कूचे में जहां चांद उगा करते थे
शब-ए-तारीक गुज़ारूंगा चला जाऊंगा

रास्ता भूल गया या यहां मंिज़ल है मेरी
कोई लाया है या ख़ुद आया हूं मालूम नहीं
कहते हैं कि नज़रें भी हसीं होती हैं
मैं भी कुछ लाया हूं क्या लाया मालूम नहीं

यूं तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब कुछ बेच आया
कहीं इनाम मिला आैर कहीं क़ीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा है
देख लो आैर न देखो तो शिकायत भी नहीं

फिर भी इक रात में सौ तरह के मोड़ आते हैं
काश तुम को कभी तन्हाई का एहसास न हो
काश ऐसा न हो ग़ैर-ए-राह-ए-दुनिया तुम को
आैर इस तरह कि जिस तरह कोई पास न हो

आज की रात जो मेरी तरह तन्हा है
मैं किस तरह गुज़ारूंगा चला जाऊंगा
तुम परेशां न हो बाब-ए-करम वा न करो
आैर कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊ
अकबर इलाहाबादी की नज़्म

ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते
सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते

आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते
अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते

किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते

परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले
क्यों हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते

हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते

गर्मी-ए-मोहब्बत में वो है आह से माने'
पंखा नफ़स-ए-सर्द का झलने नहीं देते

आज के माहौल पे कैफ़ी साहब की एक नज़्म

ऐ सबा! लौट के किस शहर से तू आती है?
तेरी हर लहर से बारूद की बू आती है!

खून कहाँ बहता है इन्सान का पानी की तरह
जिस से तू रोज़ यहाँ करके वजू आती है?

धाज्जियाँ तूने नकाबों की गिनी तो होंगी
यूँ ही लौट आती है या कर के वजू आती है?

अपने सीने में चुरा लाई है किसे की आहें
मल के रुखसार पे किस किस का लहू आती है!
दुष्यंत कुमार की कविता आपके लिए मेरे द्वारा

अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ,
तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ ।

ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता नहीं है,
इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूँ ।

अँधेरे में कुछ ज़िंदगी होम कर दी,
उजाले में अब ये हवन कर रहा हूँ ।

वे संबंध अब तक बहस में टँगे हैं,
जिन्हें रात-दिन स्मरण कर रहा हूँ ।

तुम्हारी थकन ने मुझे तोड़ डाला,
तुम्हें क्या पता क्या सहन कर रहा हूँ ।

मैं अहसास तक भर गया हूँ लबालब,
तेरे आँसुओं को नमन कर रहा हूँ ।

समाआलोचको की दुआ है कि मैं फिर,
सही शाम से आचमन कर रहा हूँ ।

मध्यस्थों के हाथ में आर्थिक नीतियों का नियंत्रण

मध्यस्थों के हाथ में आर्थिक नीतियों का नियंत्रण

कांग्रेस सरकार महंगाई पर नियंत्रण पर मतिभ्रमता की स्थिति में है। जनता के सामने बहाना बनाकर अपने निकम्मेपन को छुपाने के लिए कांग्रेस और उसके सहयोगी एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। काँग्रेस नेता महंगाई के राज्यों को उत्तरदायी बता रहे हैं। लेकिन, वर्तमान सरकार की आर्थिक नीतियॉ किसान और मजदूर विरोधी है। ये जमाखोरों और बिचोलियों को फायदा पहुंचाने वाली है। अगर हम सरकार के कार्यकाल को देखें तो यह आरोप सही साबित होता है। यह सरकार किसान विरोधी है, क्योंकि यह सरकार देश के किसान से गेहूं ९.५०/- रूपए प्रति किलो खरीद रही है और विदेश किसान से १६/- रूपए प्रति किलो खरीद रही है। पिछले साल अरहर दाल का न्यूनतम समर्थन मूल्य २३ रूपए था, विदेशी किसान को २६ रूपए दाम देकर दाल का आयात किया गया था। आज किसान से १० रूपए प्रति किलो के हिसाब से धान खरीदा जा रहा है और ग्राहक से ४० रूपए प्रति किलो वसूला जा रहा है।

कांग्रेस सरकार मार्च २००९ तक देश में चीनी के पर्याप्त भंडार होने की घोषणा करती रही। सरकार के वरिष्ठ मंत्री दो वर्ष तक चिंता नहीं करने के लिए आश्वस्त कर रहे थे। इसलिए, ४८ लाख टन चीनी १२/- रूपए प्रति किलो के हिसाब से निर्यात की गई। पिछले ६ महीनों में सरकार को अचानक याद आता है कि चीनी की कमी होने वाली है। और आज वही चीनी ३० रूपए प्रति किलो के हिसाब से आयात हो रही है। सरकार आम आदमी की विरोधी है। इसलिए सरकार विदेशी ग्राहक को १२ रूपए में चीनी बेच रही है और वहीं देशी ग्राहक से ४४ रूपए वसूल रही है। देश में चीनी के मूल्य अनियंत्रित हो रहे हैं किन्तु बंदरगाहों ३० लाख टन कच्ची चीनी ३ माह से पड़ी हुई है। सरकार उसे बाजार में लाने का कोई प्रयास ही नहीं कर रही है।

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि बिचोलिए और जमाखोर चीनी, चावल, दाल, गेहूं का कब आयात करना है और कब निर्यात करना का निर्णय कर रहे हैं। देश के किसान और गरीब आदमी को लूटा जा रहा है। कांग्रेस चुनाव में वोट आम आदमी के नाम पर लेती है लेकिन, सत्ता में आते ही सटोरियों और मुनाफाखोरों को फायदा पहुंचाती है। यह यक्ष प्रश्न है कि आखिर इस देश का किसान और गरीब आदमी कब तक लुटता रहेगा। सरकार की आर्थिक नीतियों का नियंत्रण मध्यस्थों एवं दलालों के हाथ में है। जन साधारण किससे राहत की आशा करें।

Thursday, January 28, 2010

रामधारी सिंह दिनकर की कविता

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज बनता और कल फिर फूट जाता है
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे-
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे
भारत के नागरिको के लिए

हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी

भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है

यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े

वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे
वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे
वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा

संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी
फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में
जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में

वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे
मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे

मैथली शरण गुप्त

मत लिखो भाई

हर दर-ओ-दीवार पर जब हम लिख आयेंगे
इमारतों के साये से भी लोग घबरायेंगे
खुलेंगी खिड़कियां तो शब्द लटकते नज़र आयेंगे
आएंगी आंधियां तो मतलब उखड़ जायेंगे
कितना लिखोगे कबीर तुम कब तक छपोगे
पढ़ने वाले पढ़ कर तुम्हें कहीं भूल आयेंगे
दोस्त कहाँ हो तुम. हरियाणा की रुचिका गिरहोत्रा मामले का राज़ आज सबको पता नहीं होता अगर अराधना उसकी दोस्त न होती। उन्नीस साल तक अराधना अपनी दोस्त रुचिका के इंसाफ के लिए लड़ती रही। इस दौरान उसने अपनी दोस्त को भी खो दिया। एस पी एस राठौर पुलिस की ताकत का इस्तमाल करता रहा लेकिन अराधना हार नहीं मानी। अमन के साथ शादी के बाद अराधना का मुल्क बदल गया। वो आस्ट्रेलिया और सिंगापुर रहने लगी। इसके बाद भी अराधना अपनी बचपन की दोस्त रुचिका के साथ हुई नाइंसाफी को नहीं भूली। उसके इंसाफ के लिए लड़ती रही।


चौदह-पंद्रह साल की उम्र की यह दोस्ती। हम सब इस उम्र में दोस्तों को ढूंढते हैं। घर से बाहर निकलने की बेकरारी होती है। किसी और से जुड़ कर दुनिया और खुद को समझने की तड़प। उम्र के इस पड़ाव पर लगता है कि अगर दोस्त पक्का है तो जीवन में बहुत कुछ अच्छा है। हम सब के जीवन में इस उम्र के आस-पास बहुत सारे दोस्त बनते हैं और बदलते हैं क्योंकि सब एक दूसरे में सच्चा दोस्त ढूंढते हैं।


रुचिका ने अराधना में जो दोस्त ढूंढा, उसे अराधना ने साबित कर दिया। अपने मां-बाप से इस मामले को अदालत तक ले जाने की दरख्वास्त की। अराधना के पति ने बताया कि वो अपनी कंपनी से बहाने बनाकर ऑस्ट्रेलिया से चंडीगढ़ आते थे, ताकि मुकदमें की सुनवाई के वक्त मौजूद रहे। अराधना के जज़्बे को अमन ने भी समझा। अमन ने कभी अराधना को अकेले नहीं आने दिया। राठौड़ कुछ भी कर सकता था। यह पूरा मामला आज पूरी दुनिया के सामने है क्योंकि इसमें एक सच्चे दोस्त और अच्छे जीवनसाथी की बहुत ही सक्रिय भूमिका रही है।


यही मौका है एक बार फिर से समझने के लिए कि आम हिंदुस्तानी घरों में लड़कों से संस्कार की उम्मीद कम सफलता की ही आशा ज़्यादा की जाती है। उसे नहीं सिखाया जाता कि लड़कियों को किस नज़र से देखना है। सारी तालीम लड़कियों को दी जाती है कि लड़कों की नज़र से कैसे बचें। अगर लड़के को बचपन से ही यह सीखाया जाए कि लड़कियों के साथ सामान्य बर्ताव कैसे करें तो बड़े होने पर या सत्ता हासिल होने पर राठौर जैसे हिंसक और वहशी तत्व उसके भीतर पनप नहीं सकेंगे।


अपने दोस्तों के बीच इस मुद्दे को लेकर खुल कर बात करनी चाहिए। कब तक हमारे शहरों में लड़के छेड़खानी करने के लाइसेंस लिये घूमते रहेंगे। सोच कर डर लगता है कि राठौर के इस अपराध में कितने पुलिस वालों ने साथ दिया। राठौर की वकील पत्नी ने भी साथ दिया। वो लोग कैसे आज अपनी बेटियों का सामना कर रहे होंगे जिन्होंने राठौड़ की मदद की और रुचिका के पिता सुभाष गिरहोत्रा और उसके भाई को तड़पाया।


रुचिका की कहानी सामाजिक रिश्तों के दरकने और दोस्ती के बचे रह जाने की कहानी है। दोस्तों की कीमत समझने की कोशिश कीजिए। ये रिश्ता सिर्फ हंसी मज़ाक का नहीं है बल्कि उस बुरे दौर का भी बंधन है जब सारे लोग आपके खिलाफ हो जाते हैं। इसीलिए किशोरों पर दोस्तों का प्रभाव बहुत ज़्यादा होता है। अराधना ने एक बार फिर से इस दोस्ती को गौरवान्वित किया है।

फेसबुक में सैंकड़ों अनजाने लोगों से कनेक्ट होने से तो अच्छा है कि एक अराधना मिल जाए। वो कोई राहुल भी हो सकता है। इस उम्र में हम भी अपने दोस्तों की चीज़ों को अपना समझते थे। किसी की कमीज़ पहन लेते थे तो किसी को अपना जूता दे देते थे। साझा करने का आनंद दोस्त की तलाश पूरी करता है। अब लगता है कि दोस्तों के बीच भावनात्मक संबंध कमज़ोर पड़ रहे हैं। दफ्तरों की गलाकाट प्रतियोगिता दोस्तों को प्रतियोगी बना रही है। पुराने दोस्त या तो कहीं छूट गए या फिर भूल गए।

दोस्ताना,याराना,दोस्ती, दिल चाहता है जैसी फिल्मों को देखकर लगता रहा कि काश ऐसी दोस्ती हमारे हिस्से भी होती। पुरानी फिल्मों में दोस्त का किरदार एकदम भावुक होता था। उससे उम्मीदें होती थीं। उसकी बेरुखी दिल तोड़ देती थी। संगम फिल्म का गाना दोस्त दोस्त न रहा और दोस्ताना का गाना-मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया सुना है कि तू बेवफा हो गया,याराना का गाना- तेरे जैसा यार कहां...कहां ऐसा याराना,ऐसे गाने पीढ़ियों तक दोस्ती की छवि गढ़ते रहे। आजकल की फिल्मों के दोस्त मौज मस्ती के होते हैं। प्रैक्टिकल होते हैं। इसीलिए दिल चाहता है दोस्ती के संबंधों को आज के संदर्भ में देखने वाली आखिरी फिल्म थी। वैसे तो बाद में न्यूयार्क और दोस्ताना भी आई। लेकिन अराधना का असली किस्सा अब दोस्ती के किस्सों का सबसे बड़ा किरदार बन गया है। अपने आप से पूछिये क्या आपके पास अराधना जैसी दोस्त है।
यह शहर है और मैं मुसाफिर
मेरी पीठ पर लदे बैग में,
एक लड़की की मुस्कुराहट,
थोड़ी सी भूख,
थोड़ा सा लालच,
कुछ खंडित से ख्वाब,
थोड़ी सी शराब
लिए घूम रहा हूं।
एक ही शहर में
अठारह बरस जवानी के चले गए,
लड़कियां मिली पर एक भी ऐसी नहीं
कि दिल से कहूं, हां, यही है।
फाके के दिनों से निकलकर
ढाबों पर दाल फ्राई खाते हुए
पंचतारा होटलों में
चिकन, मटन, फिश चरता रहा
भूख मिटी नहीं
जेब के चंद सिक्के,
बदल गए नोटों की गड्डियों में,
अब भी उतना ही लालची हूं,
टटोलकर देखता हूं
पीठ पर लदे बैग में
सब कुछ उतना ही सुरक्षित बचा है
लेकिन जो टूटा फूटा सा ख्वाब रखा था
वो गायब है कई साल से,
एक साल और बीत गया
यकीन से कह सकता हूं
शहर में, जिसे अठारह साल से अपना समझता हूं,
ख्वाब ही बहुत जल्द खो जाते हैं
वासना, भूख, लालच, नशा सब कुछ सुरक्षित बचा हैं,
मैं इन सबका बोझ ढो रहा हूं।

Monday, January 25, 2010

आज एक प्रश्न मेरे दिमाग में उठा की भगवान् ने हमें बनाया है या हमने भगवान को? कहीं ऐसा तो नहीं की हमने ही अपने अच्छे बुरे कामो को एक सुरक्षा वाल्व देने के लिए एक सत्ता को गढ़ लिया और आँख मूँद कर लग गए सब करने....

Sunday, January 24, 2010

क्या आपने राजा सुहेल्देओ के बारे में सुना है....... शायद नहीं, लेकिन आपने गाजी मिया के बारे में जरूर सुना होगा, कितना दुर्भाग्य है इस देश का और एक वीर राजा का भी। सन १२३३ में महमूद गजनवी के भतीजे सैएद सलार मसूद तमाम लोगों को मारते काटते और बहन बेटियों की बेइजती करते हुए बहराइच पंहुचा , वहां पर राजा सुहैल्देओ ने उसका कदा मुकाबला किया और उसे मार डाला, बाद में मसूद को गाजी की पदवी देकर पूजा जाने लगा। अब आप ही निश्चित कीजिये की वीर कौन था और किसे पूजा जाना चाहिए, एक आक्रमणकारी को या फिर एक वास्तव में वीर राजा को। या ऐसा तो नहीं की राजा एक तथाकथित छोटी जाति का था इसलिए उसकी यह उपेक्षा है।

Thursday, January 14, 2010

भगवत गीता मेरी सबसे पसंदीदा पुस्तक है, आज भी यह उतनीhee प्रासंगिक है जितनी कृष्ण के समय थी...हमारे रोज के दैनिक कार्यों में गीता का अनुसरण करें तो हम कभी भी मायूस और असफल न हों...

Sunday, January 10, 2010

हद हो गई मौकापरसती की जब तक कोई विवाद नहीं था तब तक सारी बातें आदर्शवाद की होती थी अब एक दूसरे पर आरोपों की कमी नहीं है... क्या अमर सिंह अपने पूर्व के बयानों को भूल गए? यह तो सरासर छोटी बात है की किसी की पैसों से मदद के बाद ताना देना...

Saturday, January 2, 2010

क्या आपने बढती हुई महंगाई के बारे में सोचा है, इसका कारण सिर्फ सरकार की नीतियाँ हैं । जब तक जमाखोरों पर लगाम नहीं लगाई जाएगी तब तक महंगाई से निजात पाना मुस्किल है।