बड़ा आश्चर्य होता है की गुलज़ार साहब जैसे स्थापित शायर को किसी की कविता कॉपी करने की क्या जरूरत पड़ गई। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना मेरे गृह जिले बस्ती में पैदा हुए और इलाहाबाद को अपनी कर्मस्थली बनाई । संयोग से मैं दोनों ही स्थलों से जुड़ा हूँ, और यही मेरे इस लेख को लिखने की मजबूरी भी है। मैं किसी पर आक्षेप नहीं कर रहा बल्कि सही व्यक्ति को उसका अधिकार दिलवाने की कोशिश मात्र कर रहा हूँ। अगर गुलज़ार साहब " इश्किया" फिल्म के अपने " इब्नबतूता" वाले गाने के लिए सक्सेना साहब को भी थोडा सा श्रेय दे देते तो शायद कष्ट इस तरह लेख बनकर मेरे हृदय से न निकलता।
आपके लिए सर्वेश्वर दयाल की कविता नीचे लिखी है अब आप ही फैसला कीजिये। "
इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में थोड़ी हवा नाक में घुस गई घुस गई थोड़ी कान में
कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में।"
Samajhme nahi aata kya comment diya jay? Waqayi Gulzrar ho ya aur koyi, kya zaroorat hai copy karneki?
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