Tuesday, April 19, 2011

क्रिकेट का मैच भारत पाकिस्तान के तनाव भरे रिश्तों के बीच मध्यांतर की तरह है। जिस मैच में दोनों मुल्क एक दूसरे को कुचल देने की सस्ती ख्वाहिशें पालती हैं उसी मैच के ज़रिये रिश्ते को सुधारने की भी संभावनाएं खोजी जाने लगती हैं। यह विरोधाभास नहीं है तो क्या है। इतना ज़रूर है कि क्रिकेट के ज़रिये दोनों देशों के बीच संवाद के रास्ते खुल जाते हैं। जब बंद होते हैं तब भी भारत के करोड़ों क्रिकेट प्रेमी देसी न्यूज़ चैनलों के दफ्तर में बैठे पाकिस्तान के महान खिलाड़ी ज़हीर अब्बास, इमरान ख़ान,वसीम अकरम की टिप्पणियों का आनंद लेते रहते हैं। ये क्रिकेट और क्रिकेट प्रेमियों की पेशवराना परिपक्वता है। तब तो कोई उन्माद नहीं फैलाता कि जिस इमारन और अकरम की जोड़ी ने कई बार भारतीयों को कुचला है उसे स्टुडियो से भगाओ। बल्कि लाखों क्रिकेट प्रेमी उनकी बातों को क्रिकेट के लिहाज़ से सुनते हैं। उन्हें अपना समझते हैं। इसलिए आम क्रिकेट प्रेमी इस तरह के उन्माद का हिस्सा तभी बनता है जब कृत्रिम रूप से बनाने की कोशिश की जाती है ताकि उस उन्माद के सहारे बाज़ार और विग्यापन का खेल खेला जा सके।

क्रिकेट को लेकर राजनय और राजनीति में फर्क करना चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सेमिफाइनल के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर एक राजनीतिक पासा फेंका। एक ऐसे वक्त में जब मनमोहन सिंह पर आरोप लग रहे थे कि विदेश नीति के मामलों में कमज़ोर साबित हो रहे हैं, उन्होंने विपक्ष को जवाब भी दिया और मैच देखने के बहाने एक संदेश भी दिया कि भारत पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है। मगर जब राजनयिक आपस में बात करेंगे तो ज़ाहिर है वहां क्रिकेट के स्कोर की चर्चा नहीं होगी। बातचीत की मेज़ पर इस बात का भी फर्क नहीं पड़ेगा कि मोहाली में किसने किसको हराया। मुंबई हमले के बाद अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बाद भी पाकिस्तान में हमले के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। आतंकवाद पर आज भी उसका नज़रिया बहुत साफ और भरोसा का नहीं है। क्या यह सब क्रिकेट के मैदान के ज़रिये बदल सकता है? क्या कभी ऐसा हो सकेगा कि मैच के नतीजे का असर कश्मीर की समस्या पर पड़ेगा? किसी राजनयिक से पूछेंगे तो मुस्करा देगा
चालीस साल से कई दलों की सरकारें लोकपाल बिल को लेकर जनता को ब्लैक मेल कर रही थीं,ठीक वैसे जैसे महिला आरक्षण विधेयक को लेकर करती रही हैं। कोई यह बताएगा कि महिला आरक्षण बिल राजनीतिक संवैधानिक प्रक्रिया के चलते दबा हुआ है या पास न करने की मंशा के चलते। लोकतंत्र में संविधान के तहत सरकार द्वारा बनाई गईं संस्थाएं क्या अमर हैं? क्या हम कभी सीबीआई का विकल्प नहीं सोच सकते हैं? मुंबई हमले के बाद एनआईए क्या है? सीबीआई के रहते सीवीसी का गठन क्यों किया गया?क्या सीवीसी के रहते भ्रष्टाचार हमेशा के लिए ख़त्म हो गया? अगर नहीं हुआ है तो सीवीसी क्यों हैं? भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ तो क्या अब इसके खिलाफ होने वाली हर लड़ाई को मूर्खतापूर्ण कहा जाएगा? तो क्या अब से भ्रष्टाचार पर नहीं लिखा जाएगा? क्या भ्रष्टाचार के नहीं खत्म होने से उसे एक संस्था के रूप में स्वीकार किया जा रहा है? ख़त्म नहीं हो सकता तो लड़ना क्यों हैं। भ्रष्टाचार का सरलीकरण क्या है? भ्रष्टाचार को जटिल बताने का मकसद क्या है? जटिल है तभी तो एक जटिल संस्था की मांग हो रही है जिसके पास अधिकार हो। जिन्होंने अण्णा के अनशन को भ्रष्टाचार का सरलीकरण कहा है,वो कहना क्या चाहते हैं? जंतर-मंतर में आई जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त रही है। उसे नाच गाने,बैनर-पोस्टर के बहाने भ्रष्ट तंत्र को मुंह चिढ़ाने का भी मौका मिला जिसे देखकर कई लोग सरलीकरण बता रहे हैं। काश आम लोगों की परेशानी को कोई समझ पाता

Tuesday, March 15, 2011

यह खतरनाक स्थिति है कि इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट को निर्णय देना पडा। किस तरह इच्छा मृत्यु के पक्ष में लोग अदालत में बहस कर पाये होगें यह कल्पना से बाहर की बात है।बहस तो केवल उन्हीं विषयों पर होती रही है, जिसमें अपना और दूसरों के हित टकराते है।बहस करने वाले अच्छी तरह समझते है कि यदि वे सत्य के साथ है भी तो केवल अपने स्वार्थ के कारण। इनका सत्य से कुछ भी लेना देना नहीं ,सत्य की केवल दुहाई दी जाती है।राजनीतिक मंचों आर्थिक लाभ या फिर निहित स्वार्थों के लिए बहस होती रहती है, लेकिन इच्छा मृत्यु के लिए बहस करना असम्भव है। और यह असम्भव कार्य अरूणा के नाम पर दूसरों ने कैसे किया होगा यह आश्चर्य है।
दरअसल इच्छा मृत्यु कोई बात होती ही नहीं है।यदि मृत्यु की भी इच्छा है, तो स्पष्ट है कि इच्छा करने वाला मन तो अभी सजग है ।अन्यथा इच्छा की बात कौन कर रहा है?और जब तक मन सक्रिय है तब तक मृत्यु की इच्छा कैसे हो सकती है। कुछ लोग रोगी की पीडा का हवाला देते हैं,इसका मतलब यह हुआ कि पीडाओं से मुक्ति के लिए मौत को जायज मान लिया जाए, इस तरह तो देश में आत्महत्या करने वाले किसानों की पीडा के लिए कोई समाज और सरकार कोई कसूरवार नहीं होगा जो पीडित है उसे मर जाना चाहिए। लेकिन इस तर्क का एक और पक्ष झूठा है जो कहता है कि उसको असह्य पीडा में जीना पड रहा है। जब पीडा असह्य होगी है तो उसका स्वाभाविक परिणाम मौत है ही फिर उसे जहरीला इंजैक्शन क्यों दिया जाना चाहिए।
कहीं ऐसा तो नहीं कि यह स्थिति से उकता गये लोगों की दलील हो।कुछ लोग परिस्थितियों से निराश हो सकते है। इसमें कोई शर्म नहीं होनी चाहिए,लेकिन इसके पक्ष में दलीलें पेश करना तो निश्चित ही शर्मनाक है।

Saturday, March 5, 2011

नया बजट एक आतिशबाज़ी की तरह आया, खूब तेज आवाज शोर शराबा नई चमक और एक उम्मीद की शायद कुछ देर तक सुख या मनोरंजन ही दे सके लेकिन अंत में बस फुस्स और ढेर सारा धूआ और अन्धकार
पाषाण समाज के सीने पे पडी नन्ही अश्रु की बूँद गाती है अनसुना गीत सुनाती है अजन्मी कहानी . उसकी गिरेबां को पकडे रोती ,बिलखती , कोसती, झकझोरती , सवाल करती , पता पूछती हैं उस भ्रूण हत्यारे का फिर सहसा आंसू पोछती .सोचती कहती की अच्छा हुआ जनम से पहले मिट गयी पैदा होती तो क्या होता|

Thursday, February 24, 2011

नए रेल बजट में इस बार भी यात्री किरायों में किसी विशेष बदलाव की संभावना नहीं है और यदि ऐसा होता है तो यह लगातार आठवाँ साल होगा जब रेल यात्री किरायों में परिवर्तन नहीं होगा।

रेल मंत्री ममता बनर्जी द्वारा लोकसभा में शुक्रवार को पेश किए जाने वाले रेल बजट में 100 नई ट्रेनों का ऐलान किया जा सकता है इनमें से करीब एक दर्जन नॉन स्टाप दूरंतो ट्रेनें शामिल होंगी।

पेश किए जाने वाले 2011-12 के रेल बजट में संभवत: मेट्रो शहरों में बड़े रसोईघरों की स्थापना भी उल्लेख होगा। इन रसोईघरों में प्रतिदिन 50,000 से एक लाख रेल यात्रियों के लिए भोजन तैयार किया जा सकता है। नई कैटरिंग नीति के अनुसार रेलवे खुद इन रसोईघरों की देखरेख का काम करेगी।

बनर्जी को दो माह में प. बंगाल में विधानसभा चुनावांे का सामना करना है। ऐसे में वह अपने राज्य के लिए कई परियोजनाओं की घोषणा कर सकती हैं। इनमें से व्यस्त हावड़ा से सियालदाह स्टेशनों को रेल लिंक से जोड़ने की परियोजना भी है। यह लाइन कोलकाता के घनी आबादी वाले मध्य जिलों से गुजरेगी।

Tuesday, February 15, 2011

अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी स्वर्गीय श्री महात्मा गाँधी के इस राम राज्य और अहिंसा कल्पित राज्य में आज अहिंसा की भाषा कोई नहीं सुनता है. अहिंसा के मार्ग को अपनाते हुए यदि कोई अपने अधिकारों के लिए लड़ता है तो सरकार के कानों के परदे तक उनकी आवाज नहीं पहुचती है. इतिहास गवाह है. जब तक दंगे फसाद न हो, सड़कों पर हौ हल्ला न हो, बसों, ट्रेनों में तोड़ फोड़ न हो, चक्का जाम न हो, तब तक सरकार में चेतना का प्रवाह नहीं होता है. ये आज इस देश का दुर्भाग्य ही है कि गाँधी को अपना आदर्श बताने वाली हर एक राजनीतिक पार्टी उनके बताये गए सिधांतों से बहुत दूर है.

Monday, February 14, 2011

सपने कितने अपने होते हैं इसका एहसास हमे बहुत बाद में होता है जब हम सपने देखना भूल चुके होते हैं या न देखने पर मजबूर कर दिए गए होते हैं।