क्रिकेट का मैच भारत पाकिस्तान के तनाव भरे रिश्तों के बीच मध्यांतर की तरह है। जिस मैच में दोनों मुल्क एक दूसरे को कुचल देने की सस्ती ख्वाहिशें पालती हैं उसी मैच के ज़रिये रिश्ते को सुधारने की भी संभावनाएं खोजी जाने लगती हैं। यह विरोधाभास नहीं है तो क्या है। इतना ज़रूर है कि क्रिकेट के ज़रिये दोनों देशों के बीच संवाद के रास्ते खुल जाते हैं। जब बंद होते हैं तब भी भारत के करोड़ों क्रिकेट प्रेमी देसी न्यूज़ चैनलों के दफ्तर में बैठे पाकिस्तान के महान खिलाड़ी ज़हीर अब्बास, इमरान ख़ान,वसीम अकरम की टिप्पणियों का आनंद लेते रहते हैं। ये क्रिकेट और क्रिकेट प्रेमियों की पेशवराना परिपक्वता है। तब तो कोई उन्माद नहीं फैलाता कि जिस इमारन और अकरम की जोड़ी ने कई बार भारतीयों को कुचला है उसे स्टुडियो से भगाओ। बल्कि लाखों क्रिकेट प्रेमी उनकी बातों को क्रिकेट के लिहाज़ से सुनते हैं। उन्हें अपना समझते हैं। इसलिए आम क्रिकेट प्रेमी इस तरह के उन्माद का हिस्सा तभी बनता है जब कृत्रिम रूप से बनाने की कोशिश की जाती है ताकि उस उन्माद के सहारे बाज़ार और विग्यापन का खेल खेला जा सके।
क्रिकेट को लेकर राजनय और राजनीति में फर्क करना चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सेमिफाइनल के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर एक राजनीतिक पासा फेंका। एक ऐसे वक्त में जब मनमोहन सिंह पर आरोप लग रहे थे कि विदेश नीति के मामलों में कमज़ोर साबित हो रहे हैं, उन्होंने विपक्ष को जवाब भी दिया और मैच देखने के बहाने एक संदेश भी दिया कि भारत पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है। मगर जब राजनयिक आपस में बात करेंगे तो ज़ाहिर है वहां क्रिकेट के स्कोर की चर्चा नहीं होगी। बातचीत की मेज़ पर इस बात का भी फर्क नहीं पड़ेगा कि मोहाली में किसने किसको हराया। मुंबई हमले के बाद अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बाद भी पाकिस्तान में हमले के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। आतंकवाद पर आज भी उसका नज़रिया बहुत साफ और भरोसा का नहीं है। क्या यह सब क्रिकेट के मैदान के ज़रिये बदल सकता है? क्या कभी ऐसा हो सकेगा कि मैच के नतीजे का असर कश्मीर की समस्या पर पड़ेगा? किसी राजनयिक से पूछेंगे तो मुस्करा देगा।
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