Tuesday, April 19, 2011

चालीस साल से कई दलों की सरकारें लोकपाल बिल को लेकर जनता को ब्लैक मेल कर रही थीं,ठीक वैसे जैसे महिला आरक्षण विधेयक को लेकर करती रही हैं। कोई यह बताएगा कि महिला आरक्षण बिल राजनीतिक संवैधानिक प्रक्रिया के चलते दबा हुआ है या पास न करने की मंशा के चलते। लोकतंत्र में संविधान के तहत सरकार द्वारा बनाई गईं संस्थाएं क्या अमर हैं? क्या हम कभी सीबीआई का विकल्प नहीं सोच सकते हैं? मुंबई हमले के बाद एनआईए क्या है? सीबीआई के रहते सीवीसी का गठन क्यों किया गया?क्या सीवीसी के रहते भ्रष्टाचार हमेशा के लिए ख़त्म हो गया? अगर नहीं हुआ है तो सीवीसी क्यों हैं? भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ तो क्या अब इसके खिलाफ होने वाली हर लड़ाई को मूर्खतापूर्ण कहा जाएगा? तो क्या अब से भ्रष्टाचार पर नहीं लिखा जाएगा? क्या भ्रष्टाचार के नहीं खत्म होने से उसे एक संस्था के रूप में स्वीकार किया जा रहा है? ख़त्म नहीं हो सकता तो लड़ना क्यों हैं। भ्रष्टाचार का सरलीकरण क्या है? भ्रष्टाचार को जटिल बताने का मकसद क्या है? जटिल है तभी तो एक जटिल संस्था की मांग हो रही है जिसके पास अधिकार हो। जिन्होंने अण्णा के अनशन को भ्रष्टाचार का सरलीकरण कहा है,वो कहना क्या चाहते हैं? जंतर-मंतर में आई जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त रही है। उसे नाच गाने,बैनर-पोस्टर के बहाने भ्रष्ट तंत्र को मुंह चिढ़ाने का भी मौका मिला जिसे देखकर कई लोग सरलीकरण बता रहे हैं। काश आम लोगों की परेशानी को कोई समझ पाता

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