Tuesday, March 15, 2011

यह खतरनाक स्थिति है कि इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट को निर्णय देना पडा। किस तरह इच्छा मृत्यु के पक्ष में लोग अदालत में बहस कर पाये होगें यह कल्पना से बाहर की बात है।बहस तो केवल उन्हीं विषयों पर होती रही है, जिसमें अपना और दूसरों के हित टकराते है।बहस करने वाले अच्छी तरह समझते है कि यदि वे सत्य के साथ है भी तो केवल अपने स्वार्थ के कारण। इनका सत्य से कुछ भी लेना देना नहीं ,सत्य की केवल दुहाई दी जाती है।राजनीतिक मंचों आर्थिक लाभ या फिर निहित स्वार्थों के लिए बहस होती रहती है, लेकिन इच्छा मृत्यु के लिए बहस करना असम्भव है। और यह असम्भव कार्य अरूणा के नाम पर दूसरों ने कैसे किया होगा यह आश्चर्य है।
दरअसल इच्छा मृत्यु कोई बात होती ही नहीं है।यदि मृत्यु की भी इच्छा है, तो स्पष्ट है कि इच्छा करने वाला मन तो अभी सजग है ।अन्यथा इच्छा की बात कौन कर रहा है?और जब तक मन सक्रिय है तब तक मृत्यु की इच्छा कैसे हो सकती है। कुछ लोग रोगी की पीडा का हवाला देते हैं,इसका मतलब यह हुआ कि पीडाओं से मुक्ति के लिए मौत को जायज मान लिया जाए, इस तरह तो देश में आत्महत्या करने वाले किसानों की पीडा के लिए कोई समाज और सरकार कोई कसूरवार नहीं होगा जो पीडित है उसे मर जाना चाहिए। लेकिन इस तर्क का एक और पक्ष झूठा है जो कहता है कि उसको असह्य पीडा में जीना पड रहा है। जब पीडा असह्य होगी है तो उसका स्वाभाविक परिणाम मौत है ही फिर उसे जहरीला इंजैक्शन क्यों दिया जाना चाहिए।
कहीं ऐसा तो नहीं कि यह स्थिति से उकता गये लोगों की दलील हो।कुछ लोग परिस्थितियों से निराश हो सकते है। इसमें कोई शर्म नहीं होनी चाहिए,लेकिन इसके पक्ष में दलीलें पेश करना तो निश्चित ही शर्मनाक है।

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