Thursday, January 28, 2010

यह शहर है और मैं मुसाफिर
मेरी पीठ पर लदे बैग में,
एक लड़की की मुस्कुराहट,
थोड़ी सी भूख,
थोड़ा सा लालच,
कुछ खंडित से ख्वाब,
थोड़ी सी शराब
लिए घूम रहा हूं।
एक ही शहर में
अठारह बरस जवानी के चले गए,
लड़कियां मिली पर एक भी ऐसी नहीं
कि दिल से कहूं, हां, यही है।
फाके के दिनों से निकलकर
ढाबों पर दाल फ्राई खाते हुए
पंचतारा होटलों में
चिकन, मटन, फिश चरता रहा
भूख मिटी नहीं
जेब के चंद सिक्के,
बदल गए नोटों की गड्डियों में,
अब भी उतना ही लालची हूं,
टटोलकर देखता हूं
पीठ पर लदे बैग में
सब कुछ उतना ही सुरक्षित बचा है
लेकिन जो टूटा फूटा सा ख्वाब रखा था
वो गायब है कई साल से,
एक साल और बीत गया
यकीन से कह सकता हूं
शहर में, जिसे अठारह साल से अपना समझता हूं,
ख्वाब ही बहुत जल्द खो जाते हैं
वासना, भूख, लालच, नशा सब कुछ सुरक्षित बचा हैं,
मैं इन सबका बोझ ढो रहा हूं।

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