Saturday, January 30, 2010

आज के दौर पर कैफ़ी साहब की एक नज़्म
हाथ आकर लगा गया कोई

मेरा छप्पर उठा गया कोई


लग गया इक मशीन में मैं

शहर में ले के आ गया कोई


मैं खड़ा था के पीठ पर मेरी

इश्तिहार इक लगा गया कोई


यह सदी धूप को तरसती है

जैसे सूरज को खा गया कोई


ऐसी मंहगाई है के चेहरा भी

बेच के अपना खा गया कोई


अब बोह अरमान हैं न वो सपने

सब कबूतर उड़ा गया कोई


वोह गए जब से ऐसा लगता है

छोटा मोटा खुदा गया कोई


मेरा बचपन भी साथ ले आया

गांव से जब भी आ गया कोई

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